भारत की कोरोना के बीच बड़ी कामयाबी: अब भारत में होगी हींग की खेती, जाने सबकुछ

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हिमाचल प्रदेश की आईएचबीटी लैब में लगा हींग का पौधा.

देश में हर साल 600 करोड़ रुपये का कच्चा माल हींग (Asafoetida) बनाने के लिए दूसरे देशों से खरीदा जाता है. यूपी के हाथरस (Hathras0 में हींग को प्रोसेस करने वाली करीब 60 यूनिट हैं.

नई दिल्ली. दुनिया के महंगे मसालों का ज़िक्र करो तो सबसे पहले दो नाम आते हैं, केसर (Safron) और हींग (Asafoetida). बात देशभर में खाई जाने वाली हींग की करें तो रत्तीभर हींग की पैदावार भारत (India) में नहीं होती है. लेकिन खाड़ी देशों (Gulf country) को हींग का एक्सपोर्ट किया जाता है. बड़ी खुशखबरी यह है कि अब हींग की पैदावार देश में ही होगी.

तीन साल की रिसर्च के बाद हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के पालमपुर में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (IHBT) को यह कामयाबी मिली है. देश में हर साल 600 करोड़ रुपये का कच्चा माल हींग बनाने के लिए दूसरे देशों से खरीदा जाता है. यूपी के हाथरस (Hathras0 में हींग को प्रोसेस करने वाली करीब 60 यूनिट हैं.

देश को ऐसे मिली बड़ी कामयाबी

इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी के निदेशक डॉ. संजय सिंह ने न्यूज18 हिन्दी को बताया, “हींग बनाने के लिए कच्चा माल ईरान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान से आता है. एक साल में 600 करोड़ का कच्चा माल खरीदा जाता है. लेकिन इस साल से हिमाचल प्रदेश में हींग का पौधा लगाना शुरु हो जाएगा. हमारी लैब में यह पौधा लगा हुआ है.हम तीन साल से एग्रीकल्चरल मिनिस्ट्री के साथ मिलकर इस पर रिसर्च कर रहे हैं. इस रिसर्च में हमे कामयाबी मिल चुकी है. हिमाचल के बाद जम्मू-कश्मीर और उत्तराखण्ड में भी यह पौधा लगाया जाएगा. इस पौधे को कूल एंड ड्राई मौसम चाहिए होता है. 5 साल में यह पौधा तैयार हो जाता है. हालांकि पहले किसी ने चोरी-छिपे बिना किसी तकनीकी मदद के पौधा लगाने की कोशिश की हो तो बात अलग है. वर्ना रिकॉर्ड के मुताबिक यह पहला मौका है जब हम पौधा लगाने जा रहे हैं”.
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ईरान-अफगानिस्तान से हींग बनाने के लिए आना वाला कच्चा माल.

विदेशों से आने वाले कच्चे माल से ऐसे बनती है हींग

हाथरस निवासी और हींग के जानकार श्याम प्रसाद बताते हैं, ईरान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान से रेज़ीन (दूध) आता है. एक पौधे से यह दूध निकलता है. पहले व्यापारी सीधे हाथरस में दूध लेकर आते थे. लेकिन अब दिल्ली का खारी बाबली इलाका बड़ी मंडी बन गया है. लेकिन प्रोसेस का काम आज भी हाथरस में ही होता है. 15 बड़ी और 45 छोटी यूनिट इस काम को कर रही हैं. मैदा के साथ पौधे से निकल ओलियो-गम राल (दूध) को प्रोसेस किया जाता है. कानपुर में भी अब कुछ यूनिट खुल गई हैं. देश में बनी हींग देश के अलावा खाड़ी देश कुवैत, कतर, सऊदी अरब, बहरीन आदि में एक्सपोर्ट होती है.

रिसर्च पर क्या बोले हाथरस के व्यापारी

हाथरस के हींग व्यापारी शुभम बंसल का कहना है, “इतना लम्बा वक्त बीत जाने के बाद आज भी हम हींग के कच्चे माल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं. जिसकी वजह से हींग महंगे मसालों में शुमार है. हां, एक बार पहले भी हिमाचल प्रदेश में पौधा लगाकर दूध निकालने की कोशिश की गई थी. लेकिन उससे न तो क्वालिटी मिली और न किसान को लागत के हिसाब से मुनाफा मिला. अच्छी बात है अगर इस बात कामयाबी मिल जाए तो”.


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First published: June 12, 2020, 2:21 PM IST

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